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काश यूं भी हो

  • Writer: The Wanderer
    The Wanderer
  • Feb 12
  • 1 min read

काश यूं भी हो,  ये उम्र यूं ठहर जाए ,

ये जो अधूरे से लम्हे है काश कही थम जाए ।

न भागने की हो बेचैनी , न ठहरे रहने की बेसुदगी 

जिंदगी, रफ्ता रफ्ता यूं गुज़र जाए ।


इक तरफ ख्वाशियों की परवाज़, उड़ने को बेताब है,

इक तरफ तस्लीम का ठहराव, सुकूने–लम्हे को बेकरार हैं ।

इस बेनाम सी कश्मकश में गुजरती हुई, जिंदगी! ,

काश, जुस्तजू 'उस' मंजिल की, इक बार रूबरू हो जाए ।


इक तरफ, नन्हा सा बचपन, बेबाक सा भागता ,

इस ख्वाबों के घरौंदे को बिखेरने को बेसब्र है ।

इक तरफ, गुजरा हुआ बचपन, डरा है, सहमा है

अपने पिरोए आशियां को छूटता देख 

वक्त से कुछ मुहल्लत मांगता, बेबस सा खड़ा है ।


इस जिंदगानी की मगर तासीर उल्टी है,

जितना खे॑चता हूं इसे , उतना खींचती जाए मुझसे ।

इसी खींचा तानी में, नायब लम्हों का धागा यूं ही कायम रहे,

दुआ है,  काश अगले बरस भी यूं ही खुशियों की बारिश रहे ।

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