काश यूं भी हो, ये उम्र यूं ठहर जाए ,
ये जो अधूरे से लम्हे है काश कही थम जाए ।
न भागने की हो बेचैनी , न ठहरे रहने की बेसुदगी
जिंदगी, रफ्ता रफ्ता यूं गुज़र जाए ।
इक तरफ ख्वाशियों की परवाज़, उड़ने को बेताब है,
इक तरफ तस्लीम का ठहराव, सुकूने–लम्हे को बेकरार हैं ।
इस बेनाम सी कश्मकश में गुजरती हुई, जिंदगी! ,
काश, जुस्तजू 'उस' मंजिल की, इक बार रूबरू हो जाए ।
इक तरफ, नन्हा सा बचपन, बेबाक सा भागता ,
इस ख्वाबों के घरौंदे को बिखेरने को बेसब्र है ।
इक तरफ, गुजरा हुआ बचपन, डरा है, सहमा है
अपने पिरोए आशियां को छूटता देख
वक्त से कुछ मुहल्लत मांगता, बेबस सा खड़ा है ।
इस जिंदगानी की मगर तासीर उल्टी है,
जितना खे॑चता हूं इसे , उतना खींचती जाए मुझसे ।
इसी खींचा तानी में, नायब लम्हों का धागा यूं ही कायम रहे,
दुआ है, काश अगले बरस भी यूं ही खुशियों की बारिश रहे ।
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