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Mindful Blogs


एक वक़्त
एक बार यू ही गुज़रते हुए , वक़्त मिला मुझे कहीं ठहरे हुए, एक गहरी आवाज़ में पूछा मुझसे, रूठे हुए , जो वक़्त दिया तुझे उधार में , किया कहा ज़ाया तू ने बेकार में । कुछ वक़्त सोचते हुए , बोला मैंने सहमे हुए , कुछ वख्त की दौड़ में , कुछ वक़्त ठहरे हुए , कुछ बेचैनी में, कुछ वक़्त घबराए हुए , कुछ फ़िक्र-ए-जहाँ में , कुछ बेफ़िक्री में , कुछ खुशियों की आस में , कुछ अश्कों की बेबसी में , बिताया मैंने हर वक़्त , ‘ एक वक़्त ‘ के इंतज़ार में। कुछ वक़्त सोचते हुए , एक लंबी साँस भरते हुए


काश यूं भी हो
काश यूं भी हो, ये उम्र यूं ठहर जाए , ये जो अधूरे से लम्हे है काश कही थम जाए । न भागने की हो बेचैनी , न ठहरे रहने की बेसुदगी जिंदगी, रफ्ता रफ्ता यूं गुज़र जाए । इक तरफ ख्वाशियों की परवाज़, उड़ने को बेताब है, इक तरफ तस्लीम का ठहराव, सुकूने–लम्हे को बेकरार हैं । इस बेनाम सी कश्मकश में गुजरती हुई, जिंदगी! , काश, जुस्तजू 'उस' मंजिल की, इक बार रूबरू हो जाए । इक तरफ, नन्हा सा बचपन, बेबाक सा भागता , इस ख्वाबों के घरौंदे को बिखेरने को बेसब्र है । इक तरफ, गुजरा हुआ बचपन, डरा है, सहमा
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