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काश यूं भी हो
काश यूं भी हो, ये उम्र यूं ठहर जाए , ये जो अधूरे से लम्हे है काश कही थम जाए । न भागने की हो बेचैनी , न ठहरे रहने की बेसुदगी जिंदगी, रफ्ता रफ्ता यूं गुज़र जाए । इक तरफ ख्वाशियों की परवाज़, उड़ने को बेताब है, इक तरफ तस्लीम का ठहराव, सुकूने–लम्हे को बेकरार हैं । इस बेनाम सी कश्मकश में गुजरती हुई, जिंदगी! , काश, जुस्तजू 'उस' मंजिल की, इक बार रूबरू हो जाए । इक तरफ, नन्हा सा बचपन, बेबाक सा भागता , इस ख्वाबों के घरौंदे को बिखेरने को बेसब्र है । इक तरफ, गुजरा हुआ बचपन, डरा है, सहमा
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