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एक वक़्त

  • Writer: The Wanderer
    The Wanderer
  • Apr 30
  • 1 min read

एक बार यू ही गुज़रते हुए , वक़्त मिला मुझे कहीं ठहरे हुए,

एक गहरी आवाज़ में पूछा मुझसे, रूठे हुए ,

जो वक़्त दिया तुझे उधार में , किया कहा ज़ाया तू ने बेकार में ।


कुछ वक़्त सोचते हुए , बोला मैंने सहमे हुए ,

कुछ वख्त की दौड़ में , कुछ वक़्त ठहरे हुए ,


कुछ बेचैनी में, कुछ वक़्त घबराए हुए , 

कुछ फ़िक्र-ए-जहाँ में , कुछ बेफ़िक्री में ,

कुछ खुशियों की आस में , कुछ अश्कों की बेबसी में ,

बिताया मैंने हर वक़्त , ‘ एक वक़्त ‘ के इंतज़ार में। 


कुछ वक़्त सोचते हुए , एक लंबी साँस भरते हुए ,

वक़्त ने धीमे से कहा , एक आह भरते हुए ,

दिए जो तुझको वो सारे वक़्त , जाने थे उसमे कितने वो पल ,


गुज़रती हुई राह में , मंज़िलों की चाह में ,

दौड़ते हुए मंज़रों में , ठहरे हुए उन चेहरो में ,

पोशीदा (छिपी हुई ) मुस्कुराहटो में , रूँधे हुए आवाज़ो में ,


जाने कितने गवाए तूने, वो  सारे पल ,

जो पिरोया होता उन पलो को कभी - मिल जाता तुझे वो तेरा ‘एक वक़्त ‘ भी । 

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